आपदा प्रबंधनउत्तराखंड

हिमालय की चोटियों पर भी पिघलती बर्फ का असर, 5500 मीटर तक बनने लगीं झीलें

16 ग्लेशियरों पर 30 साल के अध्ययन में चौंकाने वाला बदलाव; गंगोत्री में ऊपरी हिस्से की झीलें चार से बढ़कर 15 हुईं, भविष्य में जीएलओएफ का खतरा बढ़ने की आशंका

देहरादून। जलवायु परिवर्तन का असर अब हिमालय के ग्लेशियरों के निचले हिस्सों तक ही सीमित नहीं रह गया है। बर्फीली चोटियों के करीब, पांच से साढ़े पांच हजार मीटर की ऊंचाई पर भी पिघलती बर्फ का पानी झीलों का रूप लेने लगा है। हिमालय-काराकोरम क्षेत्र के 16 मलबा ढके ग्लेशियरों पर करीब तीन दशक तक किए गए अध्ययन में यह बदलाव सामने आया है। वर्ष 1992 में चार ग्लेशियरों के सबसे ऊपरी हिस्से में एक भी झील नहीं थी, जबकि 2022 तक सभी 16 ग्लेशियरों के ऊपरी हिस्से में झीलें दर्ज की गईं।

स्प्रिंगर के जर्नल ऑफ अर्थ सिस्टम साइंस में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, बढ़ता तापमान और बर्फबारी के पैटर्न में बदलाव इस परिवर्तन के प्रमुख कारण हैं। ग्लेशियर की सतह पर मौजूद गड्ढों और अवसादों में पिघला पानी जमा होने से बनने वाली इन सुप्राग्लेशियल झीलों की संख्या और आकार अधिकांश ग्लेशियरों में बढ़ा है।

गंगोत्री में तीन गुना बढ़ा झीलों का क्षेत्रफल

उत्तराखंड का गंगोत्री ग्लेशियर इस बदलाव का प्रमुख उदाहरण है। यहां सुप्राग्लेशियल झीलों की संख्या 1992 में 80 थी, जो 2022 में बढ़कर 129 हो गई। ग्लेशियर के सबसे ऊपरी हिस्से में झीलों की संख्या चार से बढ़कर 15 पहुंच गई। इन झीलों का संयुक्त क्षेत्रफल 0.007 वर्ग किलोमीटर से बढ़कर 0.021 वर्ग किलोमीटर हो गया।

भूटान के चोमोलहारी ग्लेशियर में भी ऊपरी हिस्से में 1992 में कोई झील नहीं थी, जबकि 2022 में सात झीलें दर्ज की गईं। हालांकि, हर क्षेत्र में बदलाव एक जैसा नहीं है। उत्तरी पाकिस्तान के पन्ना ग्लेशियर में झीलों की संख्या और क्षेत्रफल दोनों घटे, जबकि बाल्टोरो ग्लेशियर में संख्या बढ़ने के बावजूद कुल क्षेत्रफल में मामूली कमी आई।

बढ़ सकता है जीएलओएफ का खतरा

अध्ययन के सह-लेखक मृत्युंजय कुंभकार के अनुसार, ऊंचाई वाले क्षेत्रों में झीलों की संख्या और आकार बढ़ना ग्लेशियर की सतह में महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत है। ग्लेशियर के अंतिम छोर के पास झीलों के आपस में मिलने से बड़े जलाशय बन सकते हैं, जिससे भविष्य में ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (जीएलओएफ) का जोखिम बढ़ सकता है। वैज्ञानिकों के अनुसार, ग्लेशियरों और उनकी सतह पर बन रही झीलों की नियमित निगरानी जल उपलब्धता और संभावित आपदा जोखिम के आकलन के लिए महत्वपूर्ण होगी।

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