चकबंदी की चाल सुस्त, चार माह में एक गांव भी नहीं
11 पर्वतीय जिलों में पांच साल में 275 गांवों को जोड़ने का लक्ष्य, सूची के लिए जिलों को फिर भेजा जाएगा रिमाइंडर

देहरादून। पहाड़ में बिखरी कृषि जोतों को एकजुट कर खेती को संवारने और पलायन रोकने के लिए लाई गई स्वैच्छिक चकबंदी प्रोत्साहन नीति की रफ्तार सरकारी दफ्तरों में धीमी पड़ गई है। नीति अधिसूचित हुए करीब चार माह गुजरने के बावजूद 11 पर्वतीय जिलों में अब तक एक भी गांव चकबंदी के लिए चिह्नित नहीं हो पाया है। पांच वर्ष में 275 गांवों को चकबंदी से जोड़ने का लक्ष्य तय करने वाले शासन को अब जिलों को रिमाइंडर भेजने की तैयारी करनी पड़ रही है।
सरकार ने प्रत्येक पर्वतीय जिले से हर वर्ष पांच गांवों का चयन कर चकबंदी की प्रक्रिया शुरू करने का लक्ष्य रखा है। इसके लिए जिलाधिकारियों से ऐसे पांच-पांच गांवों की सूची मांगी गई थी, जहां भूमि विवाद न हों और ग्रामीण स्वेच्छा से चकबंदी के लिए तैयार हों। लेकिन चार माह बाद भी सूची शासन तक नहीं पहुंची है।
हर साल 55 गांवों में शुरू होनी है प्रक्रिया
राजस्व विभाग अब जिलों को दोबारा निर्देश भेजने की तैयारी में है। राजस्व सचिव डा. एसएन पांडेय ने बताया कि जिलाधिकारियों को गांवों के चयन में तेजी लाने के लिए रिमाइंडर भेजा जा रहा है। गांव चयनित होने के बाद भूमिधरों की आपसी सहमति से चकबंदी की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी।
नीति के अनुसार चकबंदी के लिए संबंधित क्षेत्र में कम से कम 10 हेक्टेयर भूमि होना जरूरी है। इससे कम क्षेत्रफल होने पर न्यूनतम 25 खाताधारकों की लिखित सहमति आवश्यक होगी। आवेदन बंदोबस्त अधिकारी (चकबंदी) अथवा सहायक कलेक्टर/परगनाधिकारी के समक्ष किया जा सकता है।
पहाड़ में खेतों के छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटे होने से जुताई, सिंचाई और फसल प्रबंधन मुश्किल होता है। चकबंदी से भूमि का बिखराव कम होने और कृषि-बागवानी को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। बंजर भूमि को खेती से जोड़ने और ग्रामीणों की आय बढ़ाने के साथ इसे पलायन रोकने के उपाय के तौर पर भी देखा जा रहा है। लेकिन शुरुआत के चार माह में एक भी गांव का चयन न होना 275 गांवों के लक्ष्य की समयबद्ध पूर्ति पर सवाल खड़े कर रहा है।


