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गंगोत्री से डायमंड हार्बर तक 747 तरह की वनस्पतियों का संसार

गंगा के 2500 किमी प्रवाह क्षेत्र में वनस्पति की समृद्ध विरासत सामने आई, 81 प्रतिशत पौधे देशज; नदी से दूरी बढ़ी तो घटती गई जैव विविधता

देहरादून। हिमालय से निकलकर बंगाल की खाड़ी की ओर बढ़ती गंगा सिर्फ जलधारा नहीं, बल्कि हजारों वनस्पतियों के जीवन का आधार भी है। गंगोत्री से पश्चिम बंगाल के डायमंड हार्बर तक करीब 2500 किलोमीटर लंबे गंगा प्रवाह क्षेत्र में भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई), देहरादून के अध्ययन में 747 पादप टैक्सा दर्ज किए गए हैं। खास बात यह है कि इनमें 81 प्रतिशत वनस्पतियां देशज हैं। अध्ययन ने गंगा के तटीय क्षेत्रों में मौजूद वनस्पति विविधता के साथ बदलते भू-दृश्य और बढ़ते मानवीय दबाव की तस्वीर भी सामने रखी है।

डब्ल्यूआईआई की 37वीं वार्षिक शोध संगोष्ठी में प्रस्तुत अध्ययन ‘गंगा नदी के प्रवाह क्षेत्र में वनस्पति संरचना और विविधता के प्रतिरूप’ में शोधकर्ताओं ने नदी के किनारे पौधों की उपलब्धता, वितरण और विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में वनस्पति संरचना का आकलन किया।

गंगोत्री से बंगाल तक तीन जोन में परखी गई हरियाली

अध्ययन में गंगा को ऊपरी, मध्य और निचले तीन क्षेत्रों में बांटा गया। ऊपरी गंगा में गंगोत्री से हरिद्वार, मध्य गंगा में हरिद्वार से बिहार के मैदानी क्षेत्र और निचली गंगा में बिहार से डायमंड हार्बर तक का हिस्सा शामिल किया गया। पूरे क्षेत्र को पांच-पांच किलोमीटर की 35 जैव विविधता मूल्यांकन इकाइयों (बीईयू) में बांटकर वनस्पतियों का आकलन किया गया।

दर्ज 747 टैक्सा में 735 आवृतबीजी, सात अनावृतबीजी और पांच टेरिडोफाइट शामिल हैं। वनस्पति समूहों में एस्टरेसी परिवार का दबदबा रहा। इसमें मुख्य रूप से जड़ी-बूटियां और बदलती पर्यावरणीय परिस्थितियों को सहन करने वाली प्रजातियां शामिल हैं। पोएसी में घास तथा फैबेसी में दलहनी पौधे, वृक्ष और झाड़ियां प्रमुख हैं।

ऊपरी गंगा में देशज पौधों की विविधता ज्यादा

डब्ल्यूआईआई की वरिष्ठ शोधकर्ता उमामा खान के अनुसार, ऊपरी गंगा क्षेत्र में देशज प्रजातियों की संख्या अधिक और वनस्पति संरचना अधिक विविध मिली। इसके विपरीत निचली गंगा में वनस्पति अपेक्षाकृत एकरूप रही। गैर-देशज प्रजातियां भी ऊंचाई वाले समशीतोष्ण क्षेत्रों से निचले इलाकों तक फैलती मिलीं।

नदी से दूर होते ही हरियाली पर मानवीय दबाव

अध्ययन का एक अहम निष्कर्ष यह रहा कि नदी के नजदीक वनस्पति की अधिकता है, लेकिन दूरी बढ़ने के साथ विविधता घटती जाती है। कृषि विस्तार, बस्तियों का फैलाव, भूमि उपयोग में बदलाव और बढ़ता मानवीय हस्तक्षेप इसके प्रमुख कारण बताए गए हैं। अध्ययन के अनुसार पश्चिम बंगाल में सर्वाधिक, जबकि उत्तराखंड में सबसे कम वनस्पति विविधता दर्ज हुई।

गंगा की हरियाली के संरक्षण का आधार बनेगा अध्ययन

शोधकर्ताओं के अनुसार गंगा के तटीय क्षेत्रों में देशज वनस्पतियों का संरक्षण नदी के पारिस्थितिकी तंत्र के लिए महत्वपूर्ण है। 747 टैक्सा का यह आंकड़ा गंगा के पूरे गलियारे में वनस्पति विविधता का व्यापक आधार उपलब्ध कराता है और भविष्य में जैव विविधता संरक्षण, नदी प्रबंधन तथा तटीय पारिस्थितिकी के अध्ययन में उपयोगी साबित हो सकता है।

क्या है टैक्सा: टैक्सा पौधों के वैज्ञानिक वर्गीकरण की इकाइयां हैं। इनमें प्रजाति, वंश और परिवार जैसे वर्ग शामिल होते हैं। गंगा अध्ययन में 747 टैक्सा का अर्थ 747 अलग-अलग वर्गीकृत पादप समूहों से है।

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