नौले-धारों में लौटेगी रौनक, बचेगी सदियों पुरानी विरासत
11 जिलों में 697 ऐतिहासिक व पौराणिक जलस्रोत चिह्नित, इस वर्ष 54 का होगा जीर्णोद्धार; मूल स्वरूप से नहीं होगी छेड़छाड़
देहरादून। पहाड़ों में कभी जीवन की धड़कन रहे नौले-धारे अब सिर्फ पानी के स्रोत नहीं, बल्कि सदियों पुरानी विरासत के रूप में भी सहेजे जाएंगे। उत्तराखंड में प्राकृतिक जलस्रोतों के संरक्षण की मुहिम के बीच ऐतिहासिक, पौराणिक और सांस्कृतिक महत्व वाले नौले-धारों को उनके मूल स्वरूप में संवारने की तैयारी है। स्प्रिंग एंड रिवर रिज्युविनेशन अथारिटी (सारा) ने प्रदेश के 11 जिलों में ऐसे 697 जलस्रोत चिह्नित किए हैं। इनमें से 54 का इस वर्ष जीर्णोद्धार किया जाएगा।
पर्वतीय क्षेत्रों में नौले-धारे सदियों से ग्रामीणों की पेयजल जरूरत पूरी करते रहे हैं। इनके साथ लोक परंपराएं, धार्मिक मान्यताएं और स्थानीय संस्कृति भी जुड़ी रही हैं। कई नौलों की स्थापत्य शैली भी खास पहचान रखती है। कुछ में नागर तो कुछ में कत्यूरी शैली की झलक मिलती है। समय के साथ उपेक्षा, जलस्रोतों के सूखने और आसपास हुए बदलावों के कारण इनमें से कई अस्तित्व के संकट से जूझ रहे हैं।
चंपावत में सबसे अधिक जलस्रोत
सारा के सर्वेक्षण में चंपावत के 489 नौले-धारे चिह्नित किए गए हैं। इसके बाद अल्मोड़ा में 44, चमोली में 31, देहरादून में 29, नैनीताल में 27, पिथौरागढ़ में 25 और रुद्रप्रयाग में 22 जलस्रोत शामिल हैं। बागेश्वर में 15 तथा पौड़ी, टिहरी और उत्तरकाशी में पांच-पांच नौले-धारे चिह्नित किए गए हैं।
जलस्रोत के साथ जलग्रहण क्षेत्र पर जोर
सारा की एसीईओ कहकशां नसीम के अनुसार पहले चरण में चयनित 54 नौले-धारों का जीर्णोद्धार किया जाएगा। इसमें जलस्रोतों की सफाई, आसपास के क्षेत्र का संरक्षण और पानी के स्रोत को सुरक्षित रखने से जुड़े कार्य किए जाएंगे। जलग्रहण क्षेत्र के उपचार पर विशेष ध्यान रहेगा, ताकि इनका प्रवाह लंबे समय तक बना रहे।
जीर्णोद्धार में नौले-धारों के पारंपरिक और पौराणिक स्वरूप को बरकरार रखा जाएगा। इस तरह कोशिश केवल सूखते जलस्रोतों में पानी लौटाने की नहीं, बल्कि उनसे जुड़ी पहाड़ की सांस्कृतिक स्मृतियों और ऐतिहासिक पहचान को भी अगली पीढ़ी तक पहुंचाने की है।
