बाढ़ से तबाह असम के गांव में विज्ञान ने बढ़ाया मदद का हाथ
सीएसआइआर स्मार्ट विलेज मिशन के तहत जुनाकीमंडल में 150 से अधिक लोगों को आपदा-रोधी आवास तकनीकों की जानकारी; 75 प्रतिशत तक ऊर्जा बचाने वाली सोलर हाइब्रिड तकनीक भी दिखाई
देहरादून। असम में बाढ़ की विभीषिका के बाद अब प्रभावित गांवों में पुनर्वास को वैज्ञानिक तकनीक का सहारा दिया जा रहा है। जोरहाट जिले के तिताबोर स्थित जुनाकीमंडल गांव में सीएसआइआर स्मार्ट विलेज मिशन के तहत सीएसआइआर-सीबीआरआइ की बहुविषयक टीम ने बाढ़ से क्षतिग्रस्त मकानों का वैज्ञानिक सर्वेक्षण किया। भवनों को हुए संरचनात्मक और गैर-संरचनात्मक नुकसान का आकलन कर मरम्मत, रेट्रोफिटिंग और सुदृढ़ीकरण के उपाय सुझाए गए। साथ ही ग्रामीणों को सुरक्षित, टिकाऊ और आपदा-रोधी आवास तकनीकों का प्रशिक्षण और प्रदर्शन दिया गया।
मिशन निदेशक प्रो. प्रदीप कुमार रमनचारला और नोडल वैज्ञानिक डा. किशोर एस. कुलकर्णी के मार्गदर्शन में पहुंची टीम ने बाढ़ प्रभावित भवनों के कमजोर हिस्सों की पहचान की। इसके आधार पर भवनों की सुरक्षा बढ़ाने के लिए प्लिंथ प्रोटेक्शन वाल, नॉन-इरोडेड मड प्लास्टर, फायर रिटार्डेंट थैच रूफ और बांस आधारित सुरक्षित आवास जैसी तकनीकों की जानकारी दी गई।
150 से अधिक ग्रामीणों को तकनीकी जानकारी
जुनाकीमंडल में ‘आवास सक्षम : पीएमएवाई-जी लाभार्थियों के लिए तकनीकी जागरूकता एवं प्रौद्योगिकी प्रदर्शन’ कार्यक्रम आयोजित किया गया। इसमें 150 से अधिक लोगों ने भाग लिया। कार्यक्रम का उद्देश्य ग्रामीणों को कम लागत में सुरक्षित और टिकाऊ मकान बनाने तथा बाढ़ जैसी आपदाओं के जोखिम को कम करने वाली तकनीकों से परिचित कराना था।
75 प्रतिशत तक ऊर्जा की बचत
सीएसआइआर-सीबीआरआइ ने ऊर्जा दक्ष सोलर-असिस्टेड हाइब्रिड तकनीक का प्रदर्शन भी किया। इसका इस्तेमाल पानी गर्म करने, भवनों में तापीय आराम बनाए रखने और रसोई संबंधी जरूरतों के लिए किया जा सकता है। संस्थान के अनुसार यह तकनीक पारंपरिक प्रणालियों की तुलना में 75 प्रतिशत तक ऊर्जा बचत कर सकती है। इसे गांव के विद्यालय और आंगनबाड़ी भवनों में लगाने का प्रस्ताव है। तकनीक सीएसआइआर-सीबीआरआइ रुड़की में विकसित और सत्यापित की गई है तथा कल्पा, किन्नौर और आइटीबीपी लेह-लद्दाख में भी स्थापित की जा चुकी है।
आठ घंटे में बनेंगे 2400 ईंट तक
कार्यक्रम में करीब 100 से 125 किलोग्राम वजन वाली पोर्टेबल ईंट-ब्लॉक निर्माण मशीन भी प्रदर्शित की गई। स्थानीय सामग्री से चलने वाली मशीन को बिजली या मैनुअल तरीके से संचालित किया जा सकता है। इसके जरिए आठ घंटे में 800 से 1,000 ब्लॉक अथवा 1,800 से 2,400 ईंटें तैयार की जा सकती हैं। संस्थान के अनुसार यह मैनुअल उत्पादन की तुलना में तीन से चार गुना अधिक है।
इसके अलावा बाढ़ के बाद इनडोर वायु गुणवत्ता से जुड़ी समस्याओं को देखते हुए सीमित वेंटिलेशन वाले स्थानों में उपयोग के लिए स्टैंडअलोन एयर डिसइन्फेक्शन सिस्टम लगाने का प्रस्ताव भी है।
राजमिस्त्रियों को मिलेगा प्रशिक्षण
सीएसआइआर-सीबीआरआइ गांव और आसपास के क्षेत्रों के राजमिस्त्रियों व निर्माण श्रमिकों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करेगा। इसमें सुरक्षित और वैज्ञानिक निर्माण तकनीकों की व्यावहारिक जानकारी दी जाएगी। संस्थान के अनुसार पहल का उद्देश्य ‘प्रयोगशाला से धरातल’ तक तकनीक पहुंचाकर बाढ़ प्रभावित समुदायों की आवासीय सुरक्षा, ऊर्जा दक्षता और आपदा-रोधी क्षमता को मजबूत करना है।

