उत्तराखंड

सोंग नदी की सेहत का खुलेगा राज, पांच जीव-समूह देंगे ‘इकोलॉजी’ का रिपोर्ट कार्ड

80 किलोमीटर के प्रवाह क्षेत्र में वैज्ञानिक अध्ययन शुरू, 36 केंद्रों पर जुटेगा जैव विविधता और जल गुणवत्ता का डेटा; प्रस्तावित सोंग बांध के प्रभावों का आकलन करने में भी मिलेगी मदद

देहरादून। पूर्वी दून घाटी की जीवनरेखा मानी जाने वाली सोंग नदी की सेहत अब केवल पानी की गुणवत्ता से नहीं, बल्कि उसमें और उसके आसपास पनपने वाले जीव-जंतुओं तथा वनस्पतियों की मौजूदगी से भी आंकी जाएगी। नदी के पारिस्थितिक तंत्र में होने वाले बदलावों को समय रहते पहचानने और संरक्षण की प्रभावी रणनीति तैयार करने के लिए उत्तराखंड शासन की स्प्रिंग एंड रिवर रिजुविनेशन अथॉरिटी (सारा) ने विशेष बायो इंडिकेटर प्रोजेक्ट शुरू किया है। इसके तहत पांच प्रमुख जीव-समूहों को प्राकृतिक संकेतक बनाकर नदी की पारिस्थितिकी का वैज्ञानिक मूल्यांकन किया जा रहा है।

भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआइआइ) के सेवानिवृत्त वैज्ञानिक ‘जी’ डॉ. वीपी उनियाल के सहयोग से संचालित इस अध्ययन का दायरा सोंग नदी के उद्गम क्षेत्र कद्दूखाल (टिहरी गढ़वाल) से लेकर गंगा में उसके संगम स्थल तेहरी फार्म (देहरादून) तक करीब 80 किलोमीटर है। इसका उद्देश्य नदी की जल गुणवत्ता, तटीय प्राकृतिक आवासों, जैव विविधता और मानवीय गतिविधियों के प्रभावों की समग्र तस्वीर सामने लाना है।

पानी ही नहीं, जीव-जंतुओं से भी मापी जाएगी नदी की सेहत

नदी की पारिस्थितिकी में बदलाव का पता कई बार पानी के सामान्य परीक्षण से पहले ही जीव-जंतुओं की मौजूदगी और उनकी संख्या में आने वाले बदलावों से चल जाता है। जलीय कीड़े, उनके लार्वा और दूसरे सूक्ष्म जीव प्रदूषण तथा पर्यावरणीय बदलावों के प्रति संवेदनशील होते हैं। इसी आधार पर इन्हें बायो इंडिकेटर यानी जैविक सूचक माना जाता है। परियोजना में खनन, शहरीकरण और कचरा निस्तारण जैसी मानवीय गतिविधियों के असर को भी समझने का प्रयास होगा।

पांच जीव-समूह बनेंगे नदी के प्राकृतिक निगरानी तंत्र

अध्ययन में पांच समूहों को आधार बनाया गया है। इनमें जलीय मैक्रोइनवर्टेब्रेट्स यानी पानी के भीतर रहने वाले कीड़े और उनके लार्वा शामिल हैं, जो जल प्रदूषण के प्रति संवेदनशील होते हैं। तितलियों और जंगली मधुमक्खियों जैसे परागणकर्ता नदी तट की हरियाली और वनस्पति विविधता का संकेत देंगे। ड्रैगनफ्लाई और डेम्सलफ्लाई की मौजूदगी से जल की स्वच्छता तथा तटीय आवासों की स्थिति समझी जाएगी। पक्षियों के अध्ययन से पूरी नदी घाटी के पारिस्थितिक स्वास्थ्य का आकलन होगा, जबकि तटीय वनस्पति और सूक्ष्म जीवों के जरिये पारिस्थितिक संतुलन की स्थिति का पता लगाया जाएगा।

तीन जोन में बंटी नदी, 36 स्थानों पर होगी निगरानी

करीब 80 किलोमीटर लंबे प्रवाह क्षेत्र को भौगोलिक और पर्यावरणीय विशेषताओं के आधार पर ऊपरी, मध्य और निचले तीन जोन में बांटा गया है। प्रत्येक जोन में 12 स्थायी सैंपलिंग स्टेशन बनाए गए हैं। इस तरह कुल 36 केंद्रों से नियमित आंकड़े जुटाए जा रहे हैं। छह महीने के इस अध्ययन में मौसम के आधार पर दो चरणों में फील्ड सर्वे किया जा रहा है। पहला चरण मानसून के बाद नवंबर-दिसंबर और दूसरा मानसून से पहले मार्च-अप्रैल में निर्धारित है। इससे अलग-अलग मौसमों में नदी के पारिस्थितिक तंत्र में होने वाले बदलावों की तुलना की जा सकेगी।

ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र में समृद्ध जैव विविधता के संकेत

प्रारंभिक सर्वे में ओडोनाटा, परागणकर्ताओं और जलीय जीवों की कई महत्वपूर्ण प्रजातियों की पहचान हुई है। शुरुआती आकलन के संकेत बताते हैं कि सोंग नदी का ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र जैव विविधता के लिहाज से समृद्ध है और इसे विशेष संरक्षण की जरूरत है। हालांकि, नदी की समग्र पारिस्थितिक स्थिति और अलग-अलग क्षेत्रों के बीच अंतर की स्पष्ट तस्वीर विस्तृत अध्ययन पूरा होने के बाद सामने आएगी।

सोंग बांध और बढ़ते शहरीकरण के असर को समझने में मिलेगी मदद

परियोजना का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य भविष्य की विकास योजनाओं के पर्यावरणीय प्रभावों का आकलन करना भी है। सोंग बांध प्रस्तावित होने और नदी घाटी में नगरीकरण बढ़ने के बीच यह अध्ययन आधारभूत वैज्ञानिक आंकड़े उपलब्ध कराएगा। इनके माध्यम से भविष्य में जलीय जीवन, जैव विविधता और नदी तट के प्राकृतिक आवासों पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों की तुलना की जा सकेगी।

छह महीने के अध्ययन से तैयार होने वाला बेसलाइन डेटा सोंग नदी का पहला विस्तृत वैज्ञानिक डेटाबेस होगा। इसका उपयोग केवल जल गुणवत्ता की निगरानी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी नदी घाटी के पुनरुद्धार, जैव विविधता संरक्षण और विकास योजनाओं के पर्यावरणीय आकलन के लिए भी किया जा सकेगा।

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