नैनीडांडा क्षेत्र में गुलदार ने महिला को बनाया निवाला, उत्तराखंड में गहराया मानव-वन्यजीव संघर्ष
कोटद्वार। उत्तराखंड के पर्वतीय अंचलों में मानव और वन्यजीवों के बीच बढ़ता संघर्ष अब एक खौफनाक मोड़ ले चुका है। ताजा मामला पौड़ी गढ़वाल के नैनीडांडा विकास खंड का है, जहां पट्टी बिजलौट की ग्रामसभा सत्खोलू के तोक ग्राम बणासी तल्ली में एक गुलदार ने घास काटने गई महिला को अपना निवाला बना लिया। यह हृदयविदारक घटना राज्य के पहाड़ों में लगातार गहराते मानव-वन्यजीव संघर्ष का एक और डरावना सुबूत है।
जंगल में घास काटने गई महिलाओं पर अचानक हमला
प्राप्त जानकारी के अनुसार, सुबह करीब 11 बजे बणासी तल्ली निवासी सुशीला देवी और शांति देवी अन्य दिनों की तरह गांव की महिलाओं के साथ मवेशियों के लिए घास लेने पास के जंगल में गई हुई थीं। इसी दौरान झाड़ियों में घात लगाए बैठे गुलदार ने अचानक सुशीला देवी पर हमला कर दिया।
साथ गई महिलाओं ने हिम्मत दिखाते हुए शोर मचाकर गुलदार को भगाने का प्रयास किया, लेकिन गुलदार के आगे उनकी एक न चली। गुलदार सुशीला देवी को घसीटते हुए घने जंगल की ओर ले गया। बाद में जब ग्रामीण मौके पर पहुंचे, तो झाड़ियों में सुशीला देवी का क्षत-विक्षत शव बरामद हुआ।
जनप्रतिनिधियों ने जताया शोक, वन विभाग को निर्देश
घटना के बाद से पूरे इलाके में दहशत और शोक का माहौल है। सूचना मिलते ही स्थानीय विधायक महंत दिलीप रावत ने वन विभाग को तुरंत मौके पर पहुंचने और त्वरित कार्रवाई के निर्देश दिए। वहीं, क्षेत्र पंचायत प्रमुख प्रकीर्ण नेगी भी पीड़ित परिवार को ढांढस बंधाने और स्थिति का जायजा लेने घटनास्थल पर पहुंचीं।
‘गुलदार का खौफ’ और सरकारी लाचारी
यह घटना कोई अकेली वारदात नहीं है, बल्कि उत्तराखंड के गांवों की रोज़मर्रा की कड़वी हकीकत बन चुकी है। नीतिगत और सामाजिक स्तर पर यह संघर्ष अब एक बड़े संकट का रूप ले चुका है:-
मजबूरी बनी मौत का कारण: ग्रामीण महिलाओं के लिए मवेशियों के लिए चारा (घास) और सूखी लकड़ियां लाना दैनिक जीवन का हिस्सा है। जंगल जाने की इसी मजबूरी के कारण महिलाएं और बच्चे वन्यजीवों के लिए सबसे आसान शिकार बन रहे हैं।
बस्तियों की तरफ बढ़ते कदम: जंगलों के करीब मानवीय दखल बढ़ने, प्राकृतिक आवासों के सिमटने और जंगलों में पानी व भोजन की कमी के कारण गुलदार, भालू और हाथी अब सीधे इंसानी बस्तियों का रुख कर रहे हैं।
पलायन की आग में घी: इस प्रकार के जानलेवा हमलों के कारण ग्रामीण इलाकों में डर और असुरक्षा का माहौल है, जो अंततः पहाड़ों से हो रहे पलायन को और ज़्यादा तेज़ कर रहा है।
तीखा सवाल: वन विभाग द्वारा गश्त बढ़ाने के दावों और मुआवजे के मरहम से इतर, क्या सरकार के पास इस गहराते संघर्ष को रोकने के लिए कोई ठोस, दीर्घकालिक और वैज्ञानिक मास्टरप्लान है? जब तक ग्रामीणों की जंगलों पर निर्भरता कम करने के विकल्प और वन्यजीवों के सीमा-निर्धारण की व्यवस्था नहीं होती, तब तक पहाड़ की ‘सुशीला’ जैसी माताओं-बहनों की जान यूं ही दांव पर लगी रहेगी।


