उत्तराखंड

इकोलॉजी-इकोनॉमी के संतुलन से बनेगा उत्तराखंड का ‘हिमालयी विकास मॉडल’

मुख्यमंत्री धामी बोले—सड़कें बनें तो जंगल भी बचें, रोजगार बढ़े तो नदियां भी रहें निर्मल; हिमालय बचाने वाली प्रतिभाओं को हर साल मिलेगा ‘हिमालय विभूति सम्मान’

देहरादून। उत्तराखंड के विकास के लिए अब ऐसा ‘हिमालयी विकास मॉडल’ तैयार करने पर जोर दिया जा रहा है, जिसमें आर्थिक प्रगति के साथ हिमालय की पारिस्थितिकी और प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण भी सुनिश्चित हो। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने सोमवार को हिमालय दिवस के अवसर पर वीर माधो सिंह भंडारी उत्तराखंड प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय में आयोजित ‘हिमालयो नाम नगाधिराजः’ कार्यक्रम में कहा कि उत्तराखंड के विकास का रास्ता इकोलॉजी और इकोनॉमी के संतुलन से होकर ही निकलेगा।

मुख्यमंत्री ने कहा कि हिमालय उत्तराखंड के लिए केवल पर्वत श्रृंखला नहीं, बल्कि राज्य की पहचान, संस्कृति और अस्तित्व का आधार है। इसलिए यहां विकास का मॉडल मैदानी क्षेत्रों की नकल पर नहीं, बल्कि हिमालय की संवेदनशीलता, स्थानीय जरूरतों और प्राकृतिक धारण क्षमता को ध्यान में रखकर तैयार किया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि हिमालयी विकास मॉडल का लक्ष्य ऐसा विकास होना चाहिए, जिसमें सड़कें बनें तो जंगल भी बचें, रोजगार के अवसर बढ़ें तो नदियां भी निर्मल रहें और पर्यटन का विस्तार हो तो पहाड़ों की धारण क्षमता प्रभावित न हो। विकास और पर्यावरण को एक-दूसरे का विरोधी मानने के बजाय दोनों के बीच संतुलन कायम करना जरूरी है।

पहाड़ की समृद्धि से जोड़ना होगा हिमालय संरक्षण

धामी ने कहा कि हिमालय संरक्षण को पहाड़ की आर्थिक समृद्धि से जोड़ना होगा। गांवों में रोजगार के अवसर पैदा करने, स्थानीय उत्पादों को बाजार उपलब्ध कराने, प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने, महिलाओं के आर्थिक सशक्तीकरण और पर्यावरण अनुकूल पर्यटन को प्रोत्साहित करने से स्थानीय अर्थव्यवस्था मजबूत होगी और पलायन पर भी अंकुश लगेगा।

उन्होंने कहा कि उत्तराखंड के जंगल, बुग्याल, जैव विविधता, नदियां और पारंपरिक ज्ञान राज्य की इकोलॉजिकल वेल्थ हैं। इनका संरक्षण करते हुए इन्हें स्थानीय अर्थव्यवस्था और रोजगार का आधार बनाया जा सकता है। इससे ऐसा विकास मॉडल तैयार होगा, जिसमें प्रकृति संरक्षण और आजीविका दोनों साथ आगे बढ़ेंगे।

जलवायु परिवर्तन ने बढ़ाई चुनौती

मुख्यमंत्री ने कहा कि जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग का प्रभाव हिमालयी क्षेत्रों में तेजी से महसूस किया जा रहा है। ग्लेशियरों पर दबाव, पारंपरिक जलस्रोतों का संकट, अतिवृष्टि, भूस्खलन, वनाग्नि और अचानक आने वाली बाढ़ जैसी घटनाएं हिमालय की संवेदनशीलता को उजागर कर रही हैं।

ऐसे में विकास परियोजनाओं की योजना बनाते समय आपदा जोखिम, पर्यावरणीय संवेदनशीलता और स्थानीय परिस्थितियों को प्राथमिकता देनी होगी। उन्होंने विज्ञान और तकनीक के बेहतर इस्तेमाल के साथ प्रकृति संरक्षण को विकास की नीति का अभिन्न हिस्सा बनाने पर जोर दिया।

हर साल सम्मानित होंगी हिमालय संरक्षण की विभूतियां

मुख्यमंत्री ने हिमालय के संरक्षण, संवर्धन और सतत विकास में उल्लेखनीय योगदान देने वाले लोगों के लिए ‘हिमालय विभूति सम्मान’ शुरू करने की घोषणा की। हर वर्ष हिमालय दिवस पर शोधकर्ताओं, वैज्ञानिकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और हिमालयी क्षेत्रों के लिए उल्लेखनीय काम करने वाली विशिष्ट प्रतिभाओं को यह सम्मान दिया जाएगा। इसके साथ ही उन्होंने हिमालय परिषद में मूलभूत सुविधाओं और संसाधनों के विस्तार के लिए एक करोड़ रुपये देने की घोषणा की।

हिमालय संरक्षण में जनभागीदारी जरूरी

धामी ने कहा कि हिमालय का संरक्षण केवल सरकार के प्रयासों से संभव नहीं है। इसके लिए समाज और प्रत्येक नागरिक की भागीदारी जरूरी है। पानी-बिजली की बचत, प्लास्टिक के इस्तेमाल में कमी, स्वच्छता, स्थानीय उत्पादों को प्राथमिकता और पर्यावरण अनुकूल जीवनशैली जैसे कदम हिमालय संरक्षण की मुहिम को मजबूत कर सकते हैं।

उन्होंने कहा कि उत्तराखंड के लिए हिमालयी विकास मॉडल केवल विकास की अवधारणा नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित और समृद्ध पहाड़ की दिशा तय करने का संकल्प होना चाहिए। कार्यक्रम में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी से जुड़े पांच पोस्टरों तथा ‘विज्ञान संप्रेषण’ पत्रिका के पांचवें वार्षिकांक का विमोचन भी किया गया।

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