उत्तराखंड में बढ़ता मानव-वन्यजीव संघर्ष: स्कूल जाते 15 बच्चों के सामने शावकों संग आ धमका भालू
दो महिलाओं की मौत के बाद दहशत में पोखरी क्षेत्र, बच्चों को अकेले स्कूल भेजने से भी कतरा रहे अभिभावक; वन विभाग ने कैमरा ट्रैप लगाकर बढ़ाई निगरानी

पोखरी (चमोली)। उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में बढ़ता मानव-वन्यजीव संघर्ष अब ग्रामीणों की रोजमर्रा की जिंदगी और बच्चों की पढ़ाई तक को प्रभावित करने लगा है। चमोली के पोखरी क्षेत्र में भालू की सक्रियता ने ग्रामीणों में फिर खौफ पैदा कर दिया है। सोमवार सुबह राजकीय इंटर कॉलेज गोदली जा रहे 15 छात्र-छात्राओं के सामने ढोगडम तोक में भालू अपने दो शावकों के साथ अचानक आ धमका। भालू को देखते ही बच्चों में अफरा-तफरी मच गई। सभी बच्चे शोर मचाते हुए जान बचाने के लिए वापस गांव की ओर भागे। गनीमत रही कि भालू ने बच्चों पर हमला नहीं किया और सभी सकुशल घर लौट आए।
यह घटना ऐसे समय हुई है, जब क्षेत्र में कुछ दिन पहले ही भालू के हमले से बचने के प्रयास में दो महिलाओं की मौत हो चुकी है। लगातार हो रही घटनाओं ने ग्रामीणों की चिंता को और गहरा कर दिया है। अब स्थिति यह है कि अभिभावक बच्चों को अकेले स्कूल भेजने से भी डर रहे हैं।
सुबह 7:30 बजे रास्ते में दिखाई दिया भालू
राजकीय इंटर कॉलेज गोदली के प्रधानाचार्य रुपचंद सैलानी के मुताबिक, सोमवार सुबह करीब 7:30 बजे नैल, गुणम और सिदेली गांवों के 15 छात्र-छात्राएं स्कूल के लिए निकले थे। ढोगडम तोक के पास पहुंचते ही रास्ते में उन्हें अचानक भालू और उसके दो शावक दिखाई दिए। सामने भालू को देखकर बच्चे सहम गए। उन्होंने शोर मचाया और बिना देर किए वापस गांव की ओर दौड़ पड़े। घटना की सूचना मिलने के बाद स्कूल प्रबंधन ने अभिभावकों से संपर्क किया और बच्चों को फिलहाल घर पर रहने तथा अकेले स्कूल न भेजने की सलाह दी। वन विभाग को भी मामले की जानकारी दी गई है।
भालू का सामना करने वाले छात्रों में अरमान, साहिल, अजय, अरुष, प्रियांशु, अकोल, मोहित, अरदीप, मीनाक्षी, नेहा, अरुशी, मुस्कान, अमीषा, कशिश और प्रिया शामिल हैं। नैल गांव के अरमान और मीनाक्षी ने बताया कि रास्ते में अचानक भालू अपने दोनों शावकों के साथ सामने आ गया। उसे देखते ही वे डर गए और जान बचाकर वापस गांव की ओर भागे।
दो महिलाओं की मौत ने पहले ही बढ़ा रखा है खौफ
पोखरी क्षेत्र में भालू की सक्रियता से ग्रामीण पहले से ही दहशत में हैं। पिछले शनिवार कृष्ण जन्माष्टमी के दिन सिदेली गांव की विमला देवी और लक्ष्मी देवी घास लेने जंगल गई थीं। इसी दौरान भालू के हमले से बचने के प्रयास में दोनों चट्टान से नीचे गिर गईं, जिससे उनकी मौत हो गई।
इन दो मौतों के कुछ ही दिन बाद स्कूल जाने वाले रास्ते पर बच्चों के सामने भालू और उसके शावकों की मौजूदगी ने ग्रामीणों की चिंता बढ़ा दी है। जंगल से सटे गांवों में लोगों के सामने अब रोजमर्रा के कामकाज, बच्चों की पढ़ाई और जंगल पर निर्भरता के बीच सुरक्षा का सवाल खड़ा हो गया है।
जंगल और आबादी के बीच बढ़ता टकराव
पोखरी की घटना उत्तराखंड के पर्वतीय इलाकों में गहराते मानव-वन्यजीव संघर्ष की एक और तस्वीर सामने लाती है। जंगल और आबादी के बीच लगातार बढ़ते संपर्क के कारण वन्यजीवों का रिहायशी इलाकों और आवाजाही वाले रास्तों तक पहुंचना ग्रामीणों के लिए चुनौती बनता जा रहा है।
खासकर पर्वतीय क्षेत्रों में जंगलों पर ग्रामीणों की निर्भरता अधिक होने के कारण महिलाओं और बच्चों का जंगल अथवा सुनसान रास्तों से होकर गुजरना मजबूरी है। ऐसे में भालू जैसे वन्यजीवों की बढ़ती सक्रियता ने ग्रामीणों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं।
कैमरा ट्रैप से निगरानी, वन विभाग ने बढ़ाई गश्त
केदारनाथ वन्यजीव प्रभाग की नागनाथ रेंज के वन क्षेत्राधिकारी कपिल गुसाईं ने बताया कि वन विभाग की टीम लगातार क्षेत्र में गश्त कर रही है। भालू की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए कई स्थानों पर कैमरा ट्रैप लगाए गए हैं।
डीएफओ रजत सुमन ने बताया कि जिस स्थान पर छात्रों को भालू दिखाई दिया, वहां भी वन विभाग की टीम भेजकर गश्त कराई जाएगी। उन्होंने ग्रामीणों और छात्र-छात्राओं से सतर्क रहने तथा अकेले जंगल अथवा सुनसान रास्तों पर न जाने की अपील की है।
ग्रामीण बोले- अब बच्चों की सुरक्षा सबसे बड़ी चिंता
ग्रामीणों एडवोकेट देवेंद्र सिंह राणा, केदार सिंह नेगी और दर्शन सिंह गुसाईं समेत अन्य लोगों ने कहा कि भालू की लगातार बढ़ती सक्रियता से गांवों में सामान्य जनजीवन प्रभावित हो रहा है। जंगल जाना तो दूर, अब बच्चों को स्कूल भेजना भी जोखिम भरा महसूस होने लगा है।
ग्रामीणों ने प्रभावित गांवों और स्कूल जाने वाले रास्तों पर वन विभाग की नियमित गश्त बढ़ाने, संवेदनशील क्षेत्रों को चिह्नित करने और भालू की गतिविधियों पर प्रभावी निगरानी की मांग की है।
सवाल सिर्फ भालू का नहीं, सह-अस्तित्व की चुनौती का है
पोखरी की घटना बताती है कि उत्तराखंड में मानव और वन्यजीवों के बीच टकराव अब केवल जंगलों तक सीमित नहीं रह गया है। जब वन्यजीव स्कूल के रास्तों और गांवों की सीमा तक पहुंचने लगें और ग्रामीण जंगल जाने से डरने लगें, तो यह समस्या महज एक वन्यजीव की मौजूदगी से आगे बढ़कर मानव सुरक्षा, आजीविका और वन्यजीव संरक्षण के बीच संतुलन की बड़ी चुनौती बन जाती है।


