उत्तराखंड

उत्तराखंड के खेतों पर ‘वन्यजीवों’ का कब्जा, पलायन का पांचवां सबसे बड़ा कारण बना फसल नुकसान

देहरादून। उत्तराखंड के पहाड़ों में अब केवल सुविधाओं का अभाव ही नहीं, बल्कि ‘जंगली जानवरों का आतंक’ भी ग्रामीणों को घर छोड़ने पर मजबूर कर रहा है। उत्तराखंड पलायन आयोग की ताजा रिपोर्ट ने राज्य सरकार की चिंता बढ़ा दी है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को सौंपी गई इस रिपोर्ट के अनुसार, वन्यजीवों द्वारा फसलों की तबाही अब पलायन का 5वां सबसे बड़ा कारण बनकर उभरी है।
संकट के केंद्र में चार जिले: अल्मोड़ा सबसे ज्यादा बेहाल
​रिपोर्ट के आंकड़ों के अनुसार, खेती को हो रहे नुकसान के मामले में कुमाऊं और गढ़वाल के चार जिले सबसे आगे हैं।
​अल्मोड़ा (शीर्ष पर): यहाँ सर्वाधिक 10.99% फसलें वन्यजीवों की भेंट चढ़ रही हैं।
​चंपावत: सीमांत जिले में 6.65% नुकसान दर्ज किया गया।
​नैनीताल: यहाँ 6.38% के साथ स्थिति गंभीर बनी हुई है।
​पौड़ी गढ़वाल: यहाँ 6.27% नुकसान के साथ किसान खेती से मुंह मोड़ रहे हैं।
पलायन का ये भी कारण
​अब तक माना जाता था कि केवल शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की कमी के कारण लोग पहाड़ छोड़ रहे हैं, लेकिन रिपोर्ट के अनुसार: पलायन करने वालों में से 5.61% लोगों अब केवल वन्यजीवों के डर और फसल बर्बादी के कारण गांव छोड़ा। कृषि और पशुपालन, जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं, उन पर सीधे प्रहार से किसानों की आय शून्य हो रही है।
समाधान की राह: आयोग के प्रमुख सुझाव
​पलायन आयोग ने केवल समस्या ही नहीं बताई, बल्कि सरकार को बचाव के लिए 10 सूत्रीय ‘एक्शन प्लान’ भी सुझाया है:
​जंगलों का कायाकल्प: वनों के भीतर फलदार और स्थानीय प्रजातियों के पेड़ लगाना ताकि जानवर बाहर न आएं।
​सुरक्षा कवच: सोलर फेंसिंग (सौर ऊर्जा बाड़), बायो-फेंसिंग और मधुमक्खी बाड़ का प्रयोग।
​सामूहिक खेती: बिखरी हुई जोत के बजाय ‘कॉरपोरेट या सहकारी खेती’ को बढ़ावा देना।
​आधुनिक तकनीक: वन्यजीवों की निगरानी के लिए सेंसर और आधुनिक कैमरों का उपयोग।
​पारंपरिक नुस्खे: नीम, लहसुन और गोबर के मिश्रण जैसे घरेलू उपायों का प्रशिक्षण।
​वेस्ट मैनेजमेंट: बस्तियों के पास कचरा न फेंकना ताकि जानवर आकर्षित न हों।
​त्वरित मुआवजा: फसल नुकसान होने पर बीमा और मुआवजे की प्रक्रिया को सरल व तेज बनाना।

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