उत्तराखंड

डिग्री से नहीं, हर तरह के ज्ञान से आती है जीवन में परिपूर्णता: मांझी

देहरादून में थेरवाद बौद्ध धर्म पर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन, जीवों से प्रेम, पर्यावरण संरक्षण और मानवीय मूल्यों को जीवन में उतारने पर दिया जोर; पद्मश्री माधुरी बड़थ्वाल ने लोकसंगीत को बताया वसुधैव कुटुंबकम का माध्यम

देहरादून। शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री हासिल करना या किताबी ज्ञान तक सीमित रहना नहीं, बल्कि जीवन, समाज, प्रकृति और जीव-जंतुओं के प्रति संवेदनशीलता विकसित करना भी है। जब तक मनुष्य हर तरह का ज्ञान अर्जित कर मानवीय मूल्यों को अपने आचरण में नहीं उतारेगा, तब तक शिक्षा अधूरी रहेगी। केंद्रीय सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्री जीतन राम मांझी ने रविवार को राजपुर रोड स्थित होटल हयात सेंट्रिक में आयोजित थेरवाद बौद्ध धर्म के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में यह बात कही।

वर्ल्ड थेरवाद बौद्ध सेंटर की ओर से आयोजित सम्मेलन में अश्विन पूर्णिमा के धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्व और भिक्षुओं के वर्षावास की परंपरा पर मंथन हुआ। देश-विदेश से आए बौद्ध धर्म के अनुयायियों और विद्वानों ने बौद्ध शिक्षाओं, साधना, अनुशासन तथा समाज में उनके योगदान पर विचार रखे।

मानवीय संवेदना और पर्यावरण संरक्षण भी शिक्षा का हिस्सा

मुख्य अतिथि जीतन राम मांझी ने कहा कि जब धर्म और जीवनशैली की बात होती है, तो भगवान बुद्ध की शिक्षाओं का स्मरण स्वाभाविक है। बुद्ध ने जिस मार्ग पर चलने का संदेश दिया, आज समाज कहीं न कहीं उससे दूर होता जा रहा है। भाई-भाई को नहीं समझ रहा और मनुष्य दूसरे जीवों के प्रति भी संवेदनशीलता खोता जा रहा है।

उन्होंने कहा कि सभी जीवों से प्रेम करना और उनकी रक्षा करना जरूरी है। प्रकृति के प्रति उपेक्षा और बढ़ता प्रदूषण भी गंभीर खतरे पैदा कर रहे हैं। ऐसे में शिक्षा को केवल पुस्तकों और प्रमाणपत्रों तक सीमित नहीं रखा जा सकता। सर्वांगीण विकास के लिए जीवन के विभिन्न पहलुओं को समझना और ज्ञान को व्यवहार में उतारना आवश्यक है।

वर्षावास आत्मचिंतन और साधना का अवसर

सम्मेलन में वर्ल्ड थेरवाद बौद्ध सेंटर के अध्यक्ष डॉ. एमके ओटानी ने वर्षावास की परंपरा पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि थेरवाद बौद्ध धर्म में वर्षावास का विशेष महत्व है। इस अवधि में भिक्षु वर्षा ऋतु के दौरान एक स्थान पर रहकर अध्ययन, ध्यान और साधना करते हैं। इससे आध्यात्मिक अनुशासन, आत्मचिंतन और बौद्ध शिक्षाओं के गहन अध्ययन पर ध्यान केंद्रित किया जाता है।

अश्विन पूर्णिमा वर्षावास की समाप्ति से जुड़ी महत्वपूर्ण तिथि है। इस अवसर का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व बौद्ध परंपरा में विशेष स्थान रखता है। सम्मेलन में इन परंपराओं के माध्यम से शांति, संयम और सामाजिक सद्भाव के संदेश को व्यापक स्तर पर पहुंचाने पर भी चर्चा हुई।

लोकसंगीत में दिखता है वसुधैव कुटुंबकम का भाव

कार्यक्रम में पद्मश्री लोकगायिका माधुरी बड़थ्वाल ने मांगल गीतों की प्रस्तुति दी। उन्होंने कहा कि लोकसंगीत में सभी को जोड़ने और सामूहिकता का भाव पैदा करने की शक्ति है। लोकगीत चाहे किसी भी क्षेत्र के हों, उनमें वसुधैव कुटुंबकम यानी पूरी दुनिया को एक परिवार मानने की भावना दिखाई देती है।

उन्होंने कहा कि उत्तराखंड का संगीत यहां की संस्कृति, परंपराओं और सामाजिक जीवन से गहराई से जुड़ा है। समाज में जो घटित होता है, उसकी झलक लोकगीतों में मिलती है। मांगल गीतों में जीवन के 16 संस्कारों से जुड़े प्रसंग भी समाहित हैं। बदलते समय के साथ संगीत में बदलाव स्वाभाविक है, लेकिन लोकसंगीत की मूल भावना सबको साथ लेकर चलने की है।

माधुरी बड़थ्वाल ने कहा कि लोकसंगीत में ‘तेरा-मेरा’ के बजाय ‘हमारा’ का भाव प्रमुख होता है। यही भावना समाज में आपसी प्रेम, सांस्कृतिक जुड़ाव और सद्भाव को मजबूत करती है। सम्मेलन में बौद्ध दर्शन और उत्तराखंड की लोकसंस्कृति के इन साझा मानवीय मूल्यों को भी रेखांकित किया गया।

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