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उत्तराखंड के नीचे 115 किमी चौड़ा फॉल्ट लॉक, हर साल धरती में जमा हो रही भूकंप की ऊर्जा

मेन हिमालयन थ्रस्ट पर बढ़ रहा भूगर्भीय तनाव, सतह से 20 किमी गहराई तक मजबूत लॉकिंग के संकेत; नौ साल के वैज्ञानिक अध्ययन में सामने आए अहम तथ्य

देहरादून। हिमालय की गोद में बसे उत्तराखंड के नीचे धरती के भीतर भूकंप का खतरा बढ़ाने वाली भूगर्भीय प्रक्रिया लगातार सक्रिय है। वैज्ञानिकों के ताजा अध्ययन में सामने आया है कि उत्तराखंड के नीचे मेन हिमालयन थ्रस्ट (एमएचटी) का करीब 115 किलोमीटर चौड़ा हिस्सा लंबे समय से लॉक है। सतह से लगभग 20 किलोमीटर की गहराई तक फैले इस फॉल्ट क्षेत्र में भारतीय प्लेट की लगातार गति से पैदा होने वाला तनाव सामान्य तरीके से बाहर नहीं निकल पा रहा है, बल्कि धरती के भीतर जमा हो रहा है।

सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ तमिलनाडु की भूविज्ञान की सहायक प्रोफेसर डिब्याशक्ति पांडा के नेतृत्व में वैज्ञानिकों के दल ने करीब नौ वर्षों के अध्ययन के बाद ये निष्कर्ष निकाले हैं। अध्ययन में ग्लोबल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम (जीएनएसएस) और इंटरफेरोमेट्रिक सिंथेटिक अपर्चर रडार (इन्सार) से प्राप्त आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। इन आंकड़ों से हिमालय के नीचे प्लेटों के आपसी व्यवहार, जमीन की हलचल और फॉल्ट के लॉक होने की स्थिति को समझने में मदद मिली है।

वैज्ञानिकों के अनुसार, अध्ययन क्षेत्र में प्रति वर्ष करीब 18 मिलीमीटर का स्लिप डिफिसिट दर्ज किया गया है। इसका अर्थ है कि भारतीय और यूरेशियन प्लेटों की आपसी गति के अनुपात में फॉल्ट पर उतनी खिसकन नहीं हो रही है, जितनी होनी चाहिए। प्लेटों की गति और फॉल्ट की वास्तविक हलचल के बीच का यह अंतर भूगर्भीय तनाव के रूप में जमा होता रहता है। लंबे समय तक इस स्थिति के बने रहने से क्षेत्र की भूकंपीय संवेदनशीलता को लेकर चिंता बढ़ जाती है।

हर साल जमा हो रही बड़े भूकंप के बराबर ऊर्जा

अध्ययन का एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष तनाव के लगातार संचय से जुड़ा है। प्रोफेसर डिब्याशक्ति पांडा के अनुसार, करीब 300 किलोमीटर लंबे अध्ययन क्षेत्र में जमा होने वाली तनाव ऊर्जा की मात्रा हर 100 वर्ष में एमडब्ल्यू 8.1 तीव्रता के भूकंप से निकलने वाली ऊर्जा के बराबर बताई गई है।

मोमेंट मैग्नीट्यूड (एमडब्ल्यू) भूकंप के परिमाण और उससे निकलने वाली ऊर्जा को मापने का वैज्ञानिक पैमाना है। इसका मान जितना अधिक होता है, भूकंप से निकलने वाली ऊर्जा उतनी ही अधिक होती है।

हालांकि, ऊर्जा के इस आकलन का अर्थ यह नहीं है कि उत्तराखंड में हर 100 वर्ष में एमडब्ल्यू 8.1 का भूकंप आना तय है या ऐसा भूकंप आने का समय निर्धारित कर लिया गया है। यह निष्कर्ष फॉल्ट में लंबे समय से जमा हो रहे भूगर्भीय तनाव की मात्रा को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।

जमीन की हलचल ने भी मजबूत की लॉकिंग की आशंका

वैज्ञानिकों ने वर्ष 2015 से 2024 के बीच इन्सार आंकड़ों की मदद से जमीन की ऊर्ध्वाधर हलचल का अध्ययन किया। इसमें कुछ क्षेत्रों में जमीन के अधिकतम चार से छह मिलीमीटर प्रति वर्ष तक ऊपर उठने के संकेत मिले। जीएनएसएस और इन्सार से प्राप्त आंकड़ों के संयुक्त विश्लेषण ने फॉल्ट के मजबूत लॉक होने की तस्वीर को और स्पष्ट किया है।

जीएनएसएस उपग्रहों की मदद से धरती की सतह की स्थिति और उसकी गति में होने वाले सूक्ष्म बदलावों को मापता है, जबकि इन्सार रडार आंकड़ों के जरिए जमीन की हलचल का आकलन करता है। दोनों तकनीकों के इस्तेमाल से वैज्ञानिकों को भूगर्भीय बदलावों को अधिक व्यापक तरीके से समझने में मदद मिली।

पहले कमजोर माने जा रहे हिस्से में भी मजबूत कपलिंग

अध्ययन की एक अहम बात यह है कि उत्तराखंड के नीचे मेन हिमालयन थ्रस्ट के एक हिस्से को पहले अपेक्षाकृत कमजोर या लो-कपलिंग जोन होने की संभावना के रूप में देखा गया था। नए विश्लेषण में ऐसा कोई महत्वपूर्ण कमजोर हिस्सा नहीं मिला।

अध्ययन में प्लेट कपलिंग 0.8 से अधिक पाई गई है। इसका आशय है कि प्लेटों की आपसी गति का 80 प्रतिशत से अधिक हिस्सा फॉल्ट पर लॉकिंग के रूप में दर्ज हो रहा है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, यह पूरे अध्ययन क्षेत्र में मजबूत कपलिंग का संकेत है। इससे उत्तराखंड के नीचे मौजूद भूगर्भीय संरचना और उसमें जमा हो रहे तनाव को लेकर नए सिरे से अध्ययन की आवश्यकता भी रेखांकित होती है।

गढ़वाल से कुमाऊं तक फैली भूगर्भीय व्यवस्था

मेन हिमालयन थ्रस्ट हिमालय के नीचे स्थित एक प्रमुख भूगर्भीय प्लेट सीमा है। गढ़वाल और कुमाऊं हिमालय में इसकी संरचना और व्यवहार को समझना उत्तराखंड के भूकंपीय जोखिम के आकलन के लिए महत्वपूर्ण है। उत्तरकाशी, चमोली, रुद्रप्रयाग, टिहरी और पौड़ी से लेकर बागेश्वर, अल्मोड़ा और पिथौरागढ़ तक का पर्वतीय क्षेत्र व्यापक हिमालयी भूगर्भीय व्यवस्था से जुड़ा है।

हालांकि, एमएचटी जमीन के भीतर कई किलोमीटर की गहराई पर स्थित है। इसलिए इसके अध्ययन क्षेत्र को इन सभी जिलों से होकर गुजरने वाली किसी सीधी सतही फॉल्ट रेखा के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इसका महत्व हिमालय के नीचे भारतीय और यूरेशियन प्लेटों के बीच होने वाली भूगर्भीय गतिविधियों को समझने में है।

तत्काल भूकंप की भविष्यवाणी नहीं, निगरानी जरूरी

उत्तराखंड भूकंपीय दृष्टि से संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र में स्थित है। ऐसे में मेन हिमालयन थ्रस्ट पर जमा हो रहे तनाव और जमीन की सूक्ष्म हलचल की लगातार निगरानी महत्वपूर्ण हो जाती है। वैज्ञानिकों के अनुसार, जीएनएसएस, इन्सार और अन्य भूवैज्ञानिक निगरानी प्रणालियों से मिलने वाले आंकड़े भविष्य में भूकंपीय जोखिम को बेहतर ढंग से समझने में मदद कर सकते हैं।

अध्ययन किसी तत्काल बड़े भूकंप की भविष्यवाणी नहीं करता, लेकिन यह स्पष्ट करता है कि उत्तराखंड के नीचे भूगर्भीय तनाव के संचय और फॉल्ट की लॉकिंग को गंभीरता से समझने की जरूरत है। आपदा प्रबंधन, भवन सुरक्षा, संवेदनशील क्षेत्रों में निर्माण और भूकंप पूर्व चेतावनी प्रणालियों को मजबूत करने की दिशा में ऐसे वैज्ञानिक निष्कर्ष महत्वपूर्ण आधार प्रदान कर सकते हैं।

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