हरिद्वार व उधमसिंहनगर जिले में जलागम विभाग का नवीन वैज्ञानिक प्रयोग, बिना रोपाई के होगी 66 हेक्टेयर क्षेत्र में धान की उपज
डायरेक्ट सीडेड राइस तकनीकी हो रही इस्तेमाल

देहरादून। कृषि के क्षेत्र में नवीन वैज्ञानिक तकनीकी का प्रयोग करते हुए इस वर्ष हरिद्वार व उधम सिंह नगर जिले में 66 हेक्टेयर क्षेत्र में बिना रोपाई के धान की उपज की जा रही है। जलागम विभाग की उत्तराखंड जलवायु अनुकूल बारानी कृषि परियोजना के अंतर्गत इसमें डायरेक्ट सीडेड राइस (डीएसआर) तकनीकी का प्रयोग किया जा रहा है। इस तकनीकी का प्रयोग करने से कम लागत में अधिक उपज तथा ग्रीनहाउस गैस के कम उत्सर्जन की उम्मीद की जा रही है।
उत्तराखंड में परंपरागत रूप से धान की खेती रोपाई के माध्यम से ही की जाती है लेकिन वैज्ञानिक मानते हैं कि इस तरीके से की जाने वाली धान की खेती से ग्रीन हाउस गैस के उत्सर्जन में वृद्धि होती है और खास तौर से मीथेन गैस का अधिक उत्सर्जन होता है। इसे डायरेक्ट सीडेड राइस तकनीक के माध्यम से कम किया जा सकता है। इसमें किसानों की लागत भी काम आती है और उपज भी बेहतर होती है।
यही वजह है कि विश्व बैंक वित्तपोषित उत्तराखंड जलवायु अनुकूल बारानी कृषि परियोजना के अंतर्गत प्रायोगिक तौर से हरिद्वार तथा उधमसिंहनगर जिले की 10 से अधिक ग्राम पंचायतों में डीएसआर तकनीकी का प्रयोग किया गया है। इन ग्राम पंचायत के लगभग 90 से अधिक किसान इस परियोजना से जुड़े हैं।
परियोजना के माध्यम से किसानों को तकनीकी सहयोग, प्रशिक्षण तथा उन्नत किस्म के बीज उपलब्ध कराए गए हैं। इस कार्य में कंसोर्सिया पार्टनर के रूप में केंद्रीय चावल अनुसंधान संस्थान, कटक सहयोग कर रहा है। इन क्षेत्रों में एक
हरिद्वार तथा उधमसिंहनगर जिले की कुछ ग्राम पंचायतों में अभी प्रायोगिक तौर से डीएसआर तकनीकी का इस्तेमाल किया गया है। नियमित अंतराल पर ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन की मॉनिटरिंग भी की जा रही है, ताकि परम्परागत खेती तथा डीएसआर तकनीकी के तहत होने वाले जीएचजी उत्सर्जन के अंतर का अध्ययन किया जा सके।- दिलीप जावलकर, सचिव, जलागम



