विकास और संरक्षण एक-दूसरे के विरोधी नहीं, दोनों साथ-साथ चल सकते हैं: उपराष्ट्रपति
आधुनिक वैज्ञानिक वानिकी और भारत के सभ्यतागत ज्ञान का समन्वय सतत भविष्य की कुंजी

देहरादून। उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने बुधवार को देहरादून स्थित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वन अकादमी (आईजीएनएफए) में भारतीय वन सेवा (आईएफएस) के 2025-27 बैच के परिवीक्षार्थियों तथा प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे रॉयल भूटान वन सेवा के अधिकारियों को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि आने वाले दशकों में ये अधिकारी देश के वनों, वन्यजीवों, जैव विविधता और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण एवं प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
अधिकारियों को संबोधित करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि विकास और संरक्षण एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं, बल्कि दोनों को साथ लेकर चलना संभव है। उन्होंने अधिकारियों से संरक्षण और विकास, पारिस्थितिक सुरक्षा और आजीविका तथा वर्तमान आवश्यकताओं और भावी पीढ़ियों के हितों के बीच संतुलन स्थापित करने का आह्वान किया।
उन्होंने कहा कि विकसित भारत@2047 के लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ते हुए भारतीय वन सेवा की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। देश की पारिस्थितिक सुरक्षा को मजबूत करने तथा वर्ष 2070 तक शुद्ध-शून्य उत्सर्जन के लक्ष्य को हासिल करने में वन सेवा की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।
पारंपरिक ज्ञान का सम्मान जरूरी
सी. पी. राधाकृष्णन ने कहा कि पीढ़ियों से वनों और प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्रों के साथ सामंजस्यपूर्ण जीवन जीने वाले स्थानीय समुदायों के पास प्रकृति संरक्षण का समृद्ध पारंपरिक ज्ञान है। उन्होंने अधिकारियों से इस ज्ञान का सम्मान करने और स्थानीय समुदायों को संरक्षण की प्रक्रिया का महत्वपूर्ण भागीदार बनाने का आग्रह किया।
उन्होंने कहा कि भारत के सतत भविष्य के निर्माण के लिए आधुनिक वैज्ञानिक वानिकी और देश के सभ्यतागत ज्ञान को एक-दूसरे का पूरक बनाना होगा। स्थानीय परिस्थितियों और अनुभवों से सीखते हुए सर्वोत्तम कार्यप्रणालियों को अपनाना समय की आवश्यकता है।
प्रौद्योगिकी के साथ संवेदनशीलता भी जरूरी
वानिकी क्षेत्र में तेजी से बढ़ती तकनीकी संभावनाओं का उल्लेख करते हुए उपराष्ट्रपति ने नई पीढ़ी के वन अधिकारियों से रिमोट सेंसिंग, जीआईएस, ड्रोन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डेटा आधारित प्रणालियों का प्रभावी उपयोग करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि तकनीक तभी अधिक प्रभावी होगी, जब उसका समन्वय क्षेत्रीय अनुभव, विवेकपूर्ण निर्णय क्षमता और लोगों के प्रति संवेदनशीलता के साथ किया जाए।
‘सत्यनिष्ठा से कोई समझौता नहीं’
लोक सेवा में ईमानदारी और सत्यनिष्ठा के महत्व पर जोर देते हुए सी. पी. राधाकृष्णन ने कहा कि “सत्यनिष्ठा से कोई समझौता नहीं किया जा सकता।” उन्होंने कहा कि कठिन परिस्थितियों में निर्णय लेते समय संविधान, कानून, विज्ञान और व्यापक जनहित को सर्वोच्च मार्गदर्शक बनाया जाना चाहिए।
व्यक्तिगत उपलब्धियों के बजाय टीम की सफलता को प्राथमिकता देने का संदेश देते हुए उन्होंने कहा कि निरंतर सामूहिक प्रयास ही मजबूत संस्थानों और राष्ट्रों का निर्माण करते हैं।
महिलाओं की बढ़ती भागीदारी उत्साहजनक
उपराष्ट्रपति ने वन सेवाओं में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि वर्तमान बैच में लगभग 17 प्रतिशत महिला अधिकारी प्रशिक्षु हैं। उन्होंने इसे सकारात्मक बदलाव और नारी शक्ति की बढ़ती भागीदारी का प्रमाण बताया।
करियर की सफलता का पैमाना हो संरक्षण और जनविश्वास
अधिकारियों से अपने करियर का मूल्यांकन केवल पद और पदोन्नति के आधार पर नहीं करने का आह्वान करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि उनकी वास्तविक सफलता इस बात से मापी जानी चाहिए कि उन्होंने कितने वन पुनर्स्थापित किए, कितने वन्यजीवों और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा की तथा कितने स्थानीय समुदायों का विश्वास अर्जित किया।
उन्होंने कहा कि अधिकारियों की सबसे बड़ी विरासत वह प्राकृतिक संपदा होगी, जिसे वे आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित छोड़ेंगे। उन्होंने सभी अधिकारियों से राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखने का आह्वान करते हुए कहा—“राष्ट्र प्रथम।”
इस अवसर पर उत्तराखंड के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह (सेवानिवृत्त), मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी, आईजीएनएफए के निदेशक डॉ. राजेंद्र प्रसाद, कोर्स निदेशक अजीता लोंगजाम सहित अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।



