
देहरादून। पहाड़ के गांवों में सदियों से पलती आ रही काली भेड़ ‘कोव देबर’ अब देश के वैज्ञानिक मानचित्र पर भी दर्ज हो गई है। उत्तराखंड की इस विशिष्ट भेड़ को भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) ने स्वदेशी भेड़ की नस्ल के रूप में आधिकारिक मान्यता प्रदान की है। इसके साथ ही ‘कोव देबर’ उत्तराखंड की पहली ऐसी भेड़ नस्ल बन गई है, जिसे आईसीएआर से औपचारिक नस्ल पहचान मिली है।
स्थानीय पशुपालकों के लिए यह उपलब्धि केवल एक वैज्ञानिक मान्यता नहीं, बल्कि पहाड़ की पारंपरिक पशुधन विरासत को संरक्षित करने की दिशा में बड़ा कदम मानी जा रही है। नस्ल की पहचान अब वैज्ञानिक दस्तावेजों में दर्ज होने के बाद इसके संरक्षण, वैज्ञानिक प्रजनन, आनुवंशिक सुधार और जर्मप्लाज्म संरक्षण के रास्ते भी खुल गए हैं। इससे आने वाले समय में पहाड़ी पशुपालकों की आजीविका को मजबूती मिलने की उम्मीद है।
कम संसाधनों में भी पहाड़ की आबोहवा में ढलने की क्षमता
‘कोव देबर’ की खासियत सिर्फ इसका काला रंग नहीं है। यह भेड़ पहाड़ की कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और सीमित संसाधनों के बीच भी आसानी से जीवित रहने में सक्षम है। स्थानीय वनस्पतियों पर निर्भर रहकर इसका पालन किया जाता है। यही वजह है कि लंबे समय से पौड़ी गढ़वाल, अल्मोड़ा और चमोली के ग्रामीण इलाकों में यह भेड़ स्थानीय परिवारों के पशुधन का अहम हिस्सा रही है।
करीब 1600 से 2200 मीटर की ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पाई जाने वाली ‘कोव देबर’ ने पहाड़ी जलवायु के अनुरूप खुद को ढाल लिया है। इसका काला शरीर, काले बाल और काली जीभ इसे दूसरी भेड़ नस्लों से अलग पहचान देते हैं।
43 गांवों और 80 पशुपालकों से जुटाई जानकारी
‘कोव देबर’ की वैज्ञानिक पहचान तय करने के लिए व्यापक अध्ययन किया गया। इसके तहत 43 गांवों में जाकर 80 पशुपालकों से जानकारी जुटाई गई। शोध के दौरान भेड़ों की शारीरिक विशेषताओं, उनके पालन-पोषण की परिस्थितियों और स्थानीय वातावरण में अनुकूलन क्षमता का अध्ययन किया गया। वैज्ञानिक परीक्षणों और जुटाए गए आंकड़ों के आधार पर नस्ल को स्वदेशी पशु आनुवंशिक संसाधन के रूप में दर्ज कराने की प्रक्रिया आगे बढ़ी।
प्रो. बीएन शाही की रही अहम भूमिका
इस पूरी पंजीकरण प्रक्रिया में गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, पंतनगर के पशु आनुवंशिकी एवं प्रजनन विभाग के प्रोफेसर बीएन शाही की महत्वपूर्ण भूमिका रही। वह इस परियोजना के प्रमुख वैज्ञानिक रहे हैं।
प्रो. शाही के अनुसार, ‘कोव देबर’ को मिली आधिकारिक पहचान से इसके संरक्षण और वैज्ञानिक प्रजनन के लिए नए अवसर पैदा होंगे। अब नस्ल संरक्षण के साथ वैज्ञानिक प्रजनन, आनुवंशिक सुधार, जर्मप्लाज्म संरक्षण और किसान-केंद्रित पशुधन विकास पर योजनाबद्ध तरीके से काम किया जा सकेगा।
पहचान को पशुपालकों की समृद्धि में बदलना चुनौती
अब तक पहाड़ की ढलानों और गांवों तक सीमित रही ‘कोव देबर’ की पहचान राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित हो चुकी है। वैज्ञानिक मान्यता मिलने से इस नस्ल के संरक्षण के साथ इसके बेहतर प्रजनन और पशुपालकों को आर्थिक लाभ पहुंचाने की संभावनाएं बढ़ी हैं। हालांकि, असली चुनौती अब इस उपलब्धि को जमीन पर उतारने की है, ताकि पहाड़ की यह पारंपरिक पशुधन धरोहर केवल संरक्षित ही न रहे, बल्कि ग्रामीण परिवारों की आय और आजीविका का मजबूत आधार भी बने।


