मानसून में गुलदार, गर्मियों में बाघ का बढ़ता खतरा; 20 साल के अध्ययन में सामने आया संघर्ष का पैटर्न
उत्तराखंड में मानव-वन्यजीव संघर्ष पर दो दशक के आंकड़ों का विश्लेषण, मौसम और जंगल पर निर्भरता बनी अहम वजह

देहरादून। उत्तराखंड में मानव-वन्यजीव संघर्ष की तस्वीर केवल वन्यजीवों की बढ़ती संख्या से तय नहीं होती। मौसम, मानव गतिविधियां, जंगलों पर ग्रामीणों की निर्भरता और वन्यजीवों का बदलता व्यवहार भी हमलों के पैटर्न को प्रभावित कर रहा है। वर्ष 2000 से 2019 तक के आंकड़ों के अध्ययन से सामने आया है कि मानसून में गुलदार के हमलों का खतरा बढ़ता है, जबकि गर्मियों में बाघों के साथ मानव मुठभेड़ अधिक होती है।
पालमपुर, हिमाचल प्रदेश के शोधकर्ता अमनदीप राठी के अध्ययन में उत्तराखंड में इस अवधि के दौरान हुए 132 बाघ और 1,914 गुलदार हमलों का विश्लेषण किया गया। शोध हाल ही में People and Nature जर्नल में प्रकाशित हुआ है। अध्ययन डॉ. राजीव भरतरी और भारतीय वन्यजीव संस्थान के पूर्व डीन डॉ. वाईवी झाला के मार्गदर्शन में किया गया।
अध्ययन के अनुसार समय के साथ बाघ और गुलदार दोनों के हमलों में वृद्धि हुई है, लेकिन दोनों प्रजातियों के हमलों का स्थान और समय अलग-अलग रहा। ऐसे में मानव-वन्यजीव संघर्ष कम करने के लिए दोनों प्रजातियों के लिए एक जैसी रणनीति के बजाय अलग-अलग उपाय अपनाने की जरूरत है।
मानसून में बढ़ता है गुलदार का खतरा
गुलदार बेहद अनुकूलनशील वन्यजीव हैं और मानव बस्तियों तथा खेती वाले इलाकों के आसपास भी आसानी से रह सकते हैं। अध्ययन अवधि में उत्तराखंड में गुलदार के औसतन 98 हमले प्रतिवर्ष दर्ज किए गए। इनमें करीब 22.3 प्रतिशत हमले जानलेवा रहे।
मानसून के दौरान खेतों में फसलों का घना आवरण गुलदारों को छिपने के लिए अनुकूल वातावरण उपलब्ध कराता है। यही वजह है कि इस मौसम में खेतों और आबादी के आसपास गुलदारों की मौजूदगी तथा हमलों में बढ़ोतरी देखी गई। अध्ययन में पाया गया कि मानव-गुलदार संघर्ष खास तौर पर कम से मध्यम ऊंचाई वाले क्षेत्रों में अधिक रहा। गुलदारों के हमले जंगलों तक सीमित नहीं रहे, बल्कि खेतों और मानव बस्तियों के आसपास भी बड़ी संख्या में सामने आए।
गर्मियों में जंगल जाने पर बढ़ता है बाघ से सामना
बाघों के हमलों का पैटर्न गुलदार से अलग पाया गया। अध्ययन अवधि में बाघों के औसतन सात हमले प्रतिवर्ष दर्ज किए गए, लेकिन इनमें 34.8 प्रतिशत हमले घातक रहे। अध्ययन के मुताबिक गर्मियों में बाघों के हमले बढ़ जाते हैं। इस दौरान ग्रामीण घास, लकड़ी और अन्य वन उपज जुटाने के लिए अधिक संख्या में जंगलों का रुख करते हैं। वानिकी गतिविधियों के चलते भी जंगलों में मानव आवाजाही बढ़ जाती है। बाघों के हमले मुख्य रूप से जंगलों के भीतर, संरक्षित क्षेत्रों के आसपास और कम आबादी वाले इलाकों में दर्ज किए गए। अध्ययन में बाघों के हमलों की बढ़ती आवृत्ति का संबंध राज्य में बाघों की बढ़ती आबादी से भी जोड़ा गया है।
पुरुषों पर हमले अधिक, महिलाओं और बच्चों के लिए खतरा ज्यादा
अध्ययन में यह भी सामने आया कि बाघ और गुलदार दोनों के हमलों में वयस्क पुरुष सबसे अधिक प्रभावित हुए। हालांकि, महिलाओं और बच्चों पर होने वाले हमलों में मृत्यु की दर अधिक रही। यह स्थिति संकेत देती है कि मानव-वन्यजीव संघर्ष से निपटने के लिए सामान्य सुरक्षा उपायों के साथ संवेदनशील समूहों के लिए अलग रणनीति जरूरी है। बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों की सुरक्षा पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।
जंगल पर निर्भरता कम करना अहम उपाय
अध्ययन में मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए ग्रामीणों की जंगल पर निर्भरता घटाने को महत्वपूर्ण उपाय बताया गया है। यदि लोगों को रोजमर्रा की जरूरतों के लिए बार-बार जंगल नहीं जाना पड़ेगा तो वन्यजीवों से आमना-सामना होने की संभावना भी कम होगी।
इसके लिए सुरक्षित आवास, घरों में शौचालय, पर्याप्त पेयजल, 24 घंटे बिजली और सोलर अथवा इलेक्ट्रिक कुकिंग जैसी सुविधाओं का विस्तार करने की सिफारिश की गई है। इससे ईंधन और पानी जुटाने के लिए ग्रामीणों की जंगल पर निर्भरता कम की जा सकती है। इसके अलावा वैकल्पिक आजीविका, मवेशियों को रात में सुरक्षित बाड़ों में रखने और स्टाल फीडिंग को बढ़ावा देने पर भी जोर दिया गया है।
खेतों में समूह बनाकर काम करने की सलाह
जंगल से सटे खेतों में काम करने वाले लोगों को भी अतिरिक्त सतर्कता बरतने की जरूरत है। अध्ययन के मुताबिक दिन के उजाले में समूह बनाकर खेतों में काम करना, बच्चों और बुजुर्गों की विशेष निगरानी रखना तथा संवेदनशील क्षेत्रों में आवश्यकता के अनुसार फेंसिंग करना उपयोगी कदम हो सकता है।
प्रजाति के अनुसार बनानी होगी रणनीति
अध्ययन का प्रमुख निष्कर्ष यह है कि बाघ और गुलदार से होने वाले मानव संघर्ष को एक ही नजरिए से नहीं देखा जा सकता। गुलदार जहां मानसून के दौरान खेतों और बस्तियों के आसपास अधिक चुनौती पैदा करते हैं, वहीं गर्मियों में जंगलों में बढ़ती मानवीय गतिविधियां बाघों के साथ मुठभेड़ का जोखिम बढ़ाती हैं।
ऐसे में उत्तराखंड में मानव-वन्यजीव संघर्ष कम करने की नीति में मौसम, भौगोलिक क्षेत्र, वन्यजीव की प्रजाति और ग्रामीणों की जंगल पर निर्भरता जैसे सभी पहलुओं को शामिल करना जरूरी होगा। स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप रणनीति तैयार कर ही इंसान और वन्यजीवों के बीच बढ़ते टकराव को प्रभावी ढंग से कम किया जा सकता है।


