देश के 10 प्रतिशत से अधिक जिले कई आपदाओं की चपेट में, बाढ़ और सूखे का दोहरा खतरा बढ़ा
आईआईटी रुड़की के अध्ययन में खुलासा, यूपी-बिहार समेत कई राज्यों के जिलों में बढ़ी संवेदनशीलता; जिलेवार आपदा प्रबंधन की जरूरत

देहरादून। देश में अब बाढ़ और सूखे को अलग-अलग आपदाओं के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। जिस क्षेत्र में बाढ़ तबाही मचाती है, वहां कुछ समय बाद सूखे का संकट भी गहरा सकता है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) रुड़की के शोधकर्ताओं के एक अध्ययन में सामने आया है कि देश के कई जिले इन दोनों आपदाओं के प्रति संवेदनशील हैं। अध्ययन के अनुसार, देश के 10 फीसदी से अधिक जिले ऐसे हैं, जहां कई तरह के खतरों के प्रति संवेदनशीलता अधिक है। इससे स्थानीय आबादी की आजीविका, जल संसाधनों और बुनियादी सुविधाओं पर दोहरा दबाव पड़ सकता है।
नेचर पोर्टफोलियो की शोध पत्रिका npj Natural Hazards में प्रकाशित इस अध्ययन में वर्ष 2001 और 2011 के दौरान देश के 591 जिलों का विश्लेषण किया गया। शोधकर्ताओं ने सामाजिक, जनसांख्यिकीय और बुनियादी ढांचे से जुड़े आंकड़ों के आधार पर बाढ़ और सूखे के जोखिम का आकलन करने के लिए मल्टी-हैजार्ड वल्नरेबिलिटी इंडेक्स (एमएचवीआई) तैयार किया।
पांच में से एक से अधिक जिले बाढ़ के प्रति अत्यधिक संवेदनशील
अध्ययन के मुताबिक, वर्ष 2011 तक देश के पांच में से एक से अधिक जिले बाढ़ के प्रति अत्यधिक संवेदनशील श्रेणी में पहुंच चुके थे। वहीं, करीब पांच में से एक जिले में सूखे का खतरा अधिक पाया गया। इसके अलावा, 10 फीसदी से अधिक जिले ऐसे सामने आए, जहां कई तरह की आपदाओं के प्रति संवेदनशीलता ज्यादा थी। ये निष्कर्ष इस बात की ओर इशारा करते हैं कि आपदा जोखिम का आकलन करते समय केवल किसी एक खतरे पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है।
यूपी-बिहार समेत कई राज्यों में बढ़ी चिंता
शोध में ओडिशा, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, बिहार और झारखंड के विभिन्न जिलों में बाढ़ और सूखे के प्रति संवेदनशीलता बढ़ने के संकेत मिले। उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल के जिले दोनों आपदाओं के लिहाज से अधिक संवेदनशील क्षेत्रों में शामिल रहे। ऐसे क्षेत्रों में आपदाओं का असर कृषि, आजीविका, जल उपलब्धता और आवश्यक सेवाओं पर पड़ सकता है।
आपदाओं को अलग-अलग देखने से नहीं चलेगा काम
अध्ययन का नेतृत्व करने वाले प्रो. मोहित प्रकाश मोहंती के अनुसार, बाढ़ और सूखे को आमतौर पर अलग-अलग आपदाओं के रूप में देखा जाता है, जबकि दोनों का प्रभाव एक ही सामाजिक और भौतिक व्यवस्था पर पड़ सकता है। इसलिए आपदा प्रबंधन की रणनीति बनाते समय इन खतरों के आपसी संबंध और उनके संयुक्त प्रभावों को समझना जरूरी है।
जिलेवार आकलन से बनेगी बेहतर रणनीति
शोधकर्ताओं ने जोर दिया है कि केवल राज्य स्तर के आंकड़ों के आधार पर स्थानीय जोखिमों की पूरी तस्वीर सामने नहीं आ सकती। इसके लिए जिलेवार संवेदनशीलता का आकलन कर आपदा प्रबंधन, जल संरक्षण, बुनियादी ढांचे के विकास और जलवायु अनुकूलन की योजनाएं तैयार करनी होंगी। अध्ययन को विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग का सहयोग मिला।
अध्ययन का संदेश स्पष्ट है—आपदाओं से होने वाले नुकसान को कम करने के लिए जोखिम की पहचान स्थानीय स्तर पर करनी होगी। जिले की जरूरतों और कमजोरियों के अनुरूप बनाई गई योजनाएं ही बाढ़ और सूखे जैसी चुनौतियों से निपटने में अधिक कारगर साबित हो सकती हैं।



